हरियाणा के विधानसभा चुनाव में 75 पार का नारा देने वाली बीजेपी और मनोहर लाल खट्टर सरकार महज़ 40 सीटों पर ही सिमट गई. हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी हरियाणा की सभी 10 सीटें जीतने में कामयाब रही थी, तो पांच महीने बाद ऐसा क्या हुआ कि बीजेपी 40 सीटों पर ही सिमट गई. दरअसल, ये कहानी शुरू होती है तो विधानसभा चुनाव से पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की जन आशीर्वाद यात्रा से.

मनोहर लाल ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पूरे प्रदेश में जन आशीर्वाद यात्रा निकाली जिसमें हर विधानसभा सीट में जितने भी प्रत्याशी थे सब को शक्ति प्रदर्शन करने के लिए कहा गया. अगर एक विधानसभा क्षेत्र में पांच लोग टिकट मांग रहे थे तो सभी को पांच अलग अलग जगह पर शक्ति प्रदर्शन करने के लिए कहा गया. लेकिन जब टिकट बंटवारे की बात हुई तो किसी एक व्यक्ति को ही टिकट मिला. बाकी चार बागी हो गए और यहां से शुरू होता है बीजेपी के 75 पार के नारे पर बीजेपी के ही कार्यकर्ताओं का हमला.

इसके अलावा हरियाणा में बीजेपी और ग़ैर जाट पार्टी होते हुए भी विधानसभा चुनाव में 20 जाट उम्मीदवार खड़े किए जो कि बीजेपी के लिए नुक़सानदेह रहा. इसके साथ ही जेजेपी इस चुनाव में उभरकर आयी और दुष्यंत चौटाला चौधरी देवीलाल की विरासत हासिल करने में क़ामयाब रहे

लेकिन जिंद उपचुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक बीजेपी यह मानती रही कि जेजेपी सिर्फ कांग्रेस का वोट काट रही है. इस विधानसभा चुनाव में दुष्यंत चौटाला की पार्टी ने जहां भी गैर जाट उम्मीदवार खड़े किए, उसने सिर्फ़ बीजेपी के ही वोट काटे और उन तमाम सीटों पर या तो कांग्रेस जीती या फिर दुष्यंत चौटाला की पार्टी. बीजेपी या मनोहर लाल इस राजनीतिक चाल को भी नहीं समझ पाए.

दरअसल विधानसभा चुनाव से पहले हरियाणा में बीजेपी के हौसले बुलंद थे और उन्हें लग रहा था कि बीजेपी 75 सीटें लाने वाली है. यूं कहें कि मनोहर लाल खट्टर ने खुद को हरियाणा का मोदी समझ लिया था. वह भी मानने लगे थे कि बीजेपी का टिकट विधायक बनने की गारंटी हो चुका है और शायद इसलिए विपुल गोयल, राव नरबीर सिंह जैसे कैबिनेट मंत्रियों का टिकट काटा गया और राव इंद्रजीत सिंह, कृष्णपाल गुर्जर जैसे पार्टी के दिग्गज नेताओं के परिवार के सदस्यों को टिकट देने से मना कर दिया गया.

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