बापू जी और उनका इतिहास

बापू जी और उनका इतिहास

 महात्मा गांधी वह  हैं, जिन्हें राष्ट्रपिता व बापू  कहा जाता है। बापू का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। बुधवार को पूरा देश बापू की 150वीं जयंती मना रहा है। इस दुनिया में चंद ही लोग ऐसे हैं, जिन्होंने अपने विचारों व सिद्धांतों से लोगों के जीवन पर हमेशा के लिए प्रभाव छोड़ दिया।बता दें कि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन तक गांधीजी की शख्सियत का लोहा मानते थे।
महात्मा गांधी और उनके योगदान को याद करने के लिए हर साल पूरी दुनिया में 2 अक्टूबर को गांधी जयंती मनाया जाता है। इस दौरान बापू की बातों को दोहराया जाता है। साथ ही, उनके विचारों पर चर्चा होती है। स्कूलों में बापू पर आधारित कार्यक्रम आयोजित होते हैं। वहीं, विभिन्न धर्मों व जातियों के लोग इस दिन एकजुट होते हैं।
रॉलेट सत्याग्रह की सफलता के बाद 1 अगस्त 1920 महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की। इस आंदोलन के माध्यम से गांधीजी ने लोगों से आग्रह किया कि जो भारतीय उपनिवेशवाद का खत्म करना चाहते हैं वे स्कूलों, कॉलेजों और न्यायालय न जाएं और न ही कर चुकाएं।
गांधीजी ने नमक आंदोलन से सिखाया कि अगर शासन अन्यायी है तो उसका विरोध करो। लेकिन यह विरोध अहिंसात्मक हो। अगर आप सत्य के साथ हैं तो जीत आपकी जरूर होगी।
महात्मा गांधी की दक्षिण अफ्रीका की यात्रा और सत्याग्रह के प्रति उनकी मुकम्मल सोच शायद साकार नहीं हो पाती, अगर स्थानीय भारतवंशी कारोबारी उन्हें यहां आने का प्रस्ताव नहीं देते। लंदन में कानून की पढ़ाई करने गए नौजवान मोहनदास करमचंद गांधी अपने गृह नगर पोरबंदर में वकालत जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। उसी दौरान उन्हें एक साल के लिए दक्षिण अफ्रीका के तत्कालीन ट्रांसवाल प्रांत में काम का प्रस्ताव आया था। परिवार के चौथी पीढ़ी के वंशज एबी मूसा याद करते हुए बताते हैं कि किस तरह उनके पूर्वज गांधीजी को यहां लेकर आए और दक्षिण अफ्रीका में भेदभाव के खिलाफ सत्याग्रह का मार्ग उन्होंने चुना तथा अंिहसक प्रतिरोध के इसी रास्ते का अनुसरण करते हुए बाद में गोरों से भारत को आजाद कराया।
महात्मा गांधी उस शख्सियत को कहा जाता है जिसने बिना हथियार उठाए भारत में तकरीबन 200 सालों से अपनी जड़ें जमाए आततायी, निरंकुश और अन्यायी अंग्रेजी शासन का तख्त हिलाकर रख दिया था। अहिंसा का इससे सशक्त उदाहरण दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलता।
महात्मा गांधी को विश्व पटल पर अहिंसा के प्रतीक के तौर पर जाना जाता है। उनके जन्मदिवस को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में हिंसा से त्रस्त दुनिया को जब भी शांति की जरूरत महसूस होती है तब वह हमारे देश की ओर और महात्मा गांधी के आदर्शों की ओर निहारता है।
बिहार के चंपारण जिले में सन 1917-18 महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत में किया गया यह पहला सत्याग्रह था। इसे चम्पारण सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है।
बताया जाता है कि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन भी महात्मा गांधी के मुरीद थे। उन्होंने कहा था कि आने वाली नस्लों को मुश्किल से ही इस बात पर विश्वास होगा कि हांड़-मांस से बना ऐसा कोई इंसान भी धरती पर आया था।
महात्मा गांधी का जिंदगी तमाम मानवीय आदर्शों की प्रयोगशाला रही है। उन्होंने मानव जीवन के लिए सही माने जाने वाले तमाम आदर्शों का प्रयोग अपने जीवन में किया था। गांधीजी के तीन बंदरों के बारे में हम सभी ने सुना है। बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो के प्रतीक स्वरूप ये तीनों बंदर हमें जीवन जीने के सही तरीके के बारे में बताते हैं। इस संदेश को अगर हम अपने जीवन में उतार लें तो हमारी कितनी समस्याएं अपने आप सुलझ जाएं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर बुधवार को राजघाट पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी राष्ट्रपिता को पुष्पांजलि अर्पित की। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने इस अवसर पर कई समारोह आयोजित किए जाने की योजना बनाई है।
अंग्रेजों के खिलाफ सफल आंदोलनों की वजह से गांधी जी की कीर्ति पूरे भारत में फैल गई थी। आंदोलनों की सफलता के बाद ही उन्हें गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा “महात्मा” और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस द्वारा “राष्ट्रपिता” की उपाधि मिली। बाद में उन्हें सभी इसी नाम से पुकारने लगे।
गांधी जी ने 1930 में दांडी नमक यात्रा शुरू की थी। उनकी बातें, विचार और तरीकों ने जनता को उनका मुरीद बना दिया था, जिसके बाद लोग उनसे जुड़ते चले गए।
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